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MPPSC Syllabus 2020 in Hindi pdf download : MPPSC syllabus 2020 in hindi

राज्य सेवा  (प्रारंभिक) परीक्षा पाठ्यक्रम प्रथम प्रश्न पत्र सामान्य अध्ययन MPPSC Syllabus 2020 in Hindi pdf download  : MPPSC  syllabus 2020 in hindi  1. मध्यप्रदेश का इतिहास, संस्कृति एवं साहित्य  -  • मध्यप्रदेश के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएँ, प्रमुख राजवंश । • स्वतंत्रता आन्दोलन में मध्यप्रदेश का योगदान । - मध्यप्रदेश की प्रमुख कलाएँ एवं स्थापत्य कला। • मध्यप्रदेश की प्रमुख जनजातियाँ एवं बोलियाँ । प्रदेश के प्रमुख त्योहार, लोक संगीत, लोक कलाएँ एवं लोक-साहित्य । • मध्यप्रदेश के प्रमुख साहित्यकार एवं उनकी कृतियाँ । • मध्यप्रदेश के प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थल । • मध्यप्रदेश के प्रमुख जनजातीय व्यक्तित्व । 2. भारत का इतिहास  -  • प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास की प्रमुख विशेषताएँ, घटनाएँ एवं उनकी प्रशासनिक, सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्थाएँ। • 19वी एवं 20वी शताब्दी में सामाजिक तथा धार्मिक सुधार आंदोलन । • स्वतंत्रता संघर्ष एवं भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन । • स्वतंत्रता के पश्चात् भारत का एकीकरण एवं पुनर्गठन। 3. मध्यप्रदेश का भूगोल  - • ...

राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस 24 अप्रैल :

National Panchayati Raj Day  (राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस 24 अप्रैल) :  ◆ पहला राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस 2010 में मनाया गया था ।  ◆ जनवरी 1957 में बलवंत राय मेहता समिति की अध्यक्षता के सिफारिश पर पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना  ।  ◆ 73 वें संशोधन 1992 ने संविधान में एक नया भाग IX जोड़ा, जिसका शीर्षक "पंचायतों"  ◆ जिसमें अनुच्छेद 243 से 243 (O) तक के प्रावधान शामिल हैं ◆ 3 स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था  🔹1.ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत 🔹2.ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति  🔹3.जिला स्तर पर जिला परिषद ◆ पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 2 अक्टूबर, 1959 में राजस्थान के नागौर में पंचायती राज व्यवस्था का विधिवत उद्घाटन किया।  ◆ राजस्थान के नागौर देश का पहला राज्य बना जहां पंचायती राज को लागू किया गया। ◆ पंचायत राज मंत्री :  - नरेंद्र सिंह तोमर लोकसभा क्षेत्र  - मुरैना म.प्र । निम्न राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था लागू नहीं है :- 1) नागालैंड 2) मिजोरम  3) दिल्ली को छोड़कर सभी केंद्र शासित प...

मोपला विद्रोह (1836-85): केरल मालाबार क्षेत्र

मोपला विद्रोह (1836-85 ई.) : केरल मालाबार क्षेत्र  • मोपला केरल के मालाबार क्षेत्र में लगभग 1000 वर्ष से अधिक समय से रह रहे अरब एवं मलयाली मुसलमान थे। ये अधिकतर छोटे किसान या व्यापारी थे। ब्रिटिश सरकार ने भू-स्वामियों के अधिकार का विस्तार करके उच्च जातीय हिन्दू नम्बूदरी एवं नायर भू-स्वामियों की शक्ति बढ़ा दी थी। इसके फलस्वरूप मोपलाओं ने विद्रोह किया। - इस विद्रोह ने साम्प्रदायिक रूप धारण कर लिया, क्योकि अधिकांश भू-स्वामी हिन्दू थे तथा काश्तकार मुसलमान थे। • मोपला किसान मालाबार के हिन्द नम्बूदरी एवं नायर उच्च जाति, भू-स्वामियों के बटाइदार या असामी काश्तकार थे। • नम्बूदरी और नायर जैसे उच्च जाति के भू-स्वामियों को शासन, पुलिस और न्यायालय से संरक्षण प्राप्त था। मुसलमानों के धार्मिक गुरु तथा स्थानीय नेता अली मुसलियार को गिरफ्तार कराने के प्रयास में मस्जिदों पर छापे मारे गए, परिणामस्वरूप पुलिस को विद्रोहियों के आक्रामक तेवरों का सामना करना पड़ा, कई विद्रोही मारे गए। • वर्ष 1921 में अली मुसलियार के नेतृत्व में पुन: इस आन्दोलन की शुर...

रामोसी आंदोलन (1822-41 ई.) :चित्तर सिंह और नरसिंह पेतकर

रामोसी आन्दोलन (1822-41 ई.) :  • रामोसी आन्दोलन महाराष्ट्र में अकाल तथा भूख की समस्या के चलते प्रारम्भ हुआ था। चित्तर सिंह एवं नरसिंह पेतकर इसके प्रमुख नेता थे। रामोसियों ने सतारा के आस-पास के क्षेत्रों को लूटा तथा किलों पर भी आक्रमण कर दिया।  1825-1826 ई. में भयंकर अकाल और अन्नाभाव के कारण इन्होंने उमाजी के नेतृत्त्व में पुनः विद्रोह किया। यह विद्रोह लगातार 1841 ई. तक चलता रहा। इस काल में नरसिंह दन्तत्रिय पेतकर के नेतृत्व में विस्तृत दंगे हुए।

आर्य समाज : स्वामी दयानंद सरस्वती #

आर्य समाज और स्वामी दयानंद सरस्वती : • आर्य समाज की स्थापना 1875 ई. में बम्बई में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने की। 1877 ई. में इसका मुख्यालय लाहौर को बनाया गया था। • हिन्दू धर्म के दोषों को उजागर करने के साथ उन्होंने वेदों के अध्ययन पर बल दिया। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वेदों की ओर लौटों नारा दिया। • स्वामी दयानन्द सरस्वती ने गौसेवा के लिए गौरक्षिणी सभा की स्थापना की थी तथा गौकरुणानिधि नामक पुस्तक की रचना भी की थी।  - आर्य समाज का प्रसार पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा महाराष्ट्र में अधिक हुआ था। - दयानन्द सरस्वती ने हिन्दू धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाने वालों के लिए शुद्धि आन्दोलन चलाया था। - स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आगरा में पाखण्ड-खाण्डिनीपताका फहराई थी। - इनके सहयोगी-लाला हंसराज ने 1886 ई. में दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज (लाहौर) तथा स्वामी श्रद्धानन्द ने गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार की स्थापना की थी।   स्वामी दयानंद सरस्वती :  स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म 1824 ई. में गुजरात के मौरवी नामक स्थान पर...

थियोसोफिकल सोसायटी : एनी बेसेंट #

थियोसोफिकल सोसायटी  :  • थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना 1875 ई. में न्यूयॉर्क (अमेरिका) में मैडम हेलना ब्लावाट्स्की तथा कर्नल हेनरी ऑल्काट ने की थी। • 1883 ई. में मद्रास (चेन्नई) के निकट अड्यार नामक स्थान पर थियोसोफिकल सोसायटी का मुख्यालय बनाया गया। 1893 ई. में । आयरिश महिला ऐनी बेसेण्ट भारत आई और उन्होंने थियोसोफिकल सोसायटी का कार्यभार सम्भाला। ऐनी बेसेण्ट ने वर्ष 1915 में आयरलैण्ड के होमरूल लीग की तर्ज पर भारत में होमरूल लीग की स्थापना की। • थियोसोफिकल सोसायटी की हिन्दू धर्म की व्याख्या पारम्परिक तथा रूढ़िवादी थी। इसके कई भारतीय नेता-डॉ. भगवान दास तथा एस सुब्रह्मण्यम् अय्यर हिन्दू रूढ़िवादिता के समर्थक थे, लेकिन इनके  सामाजिक सिद्धान्त प्रगतिशील तथा महत्त्वपूर्ण थे। ऐनी बेसेण्ट : - ऐनी बेसेण्ट ने 1898 ई. में बनारस में सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना की थी, जिसे वर्ष 1916 में मदन मोहन मालवीय जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया था।  - इनकी विचारधारा को देवा विज्ञान के नाम से भी जाना जाता था।  - ऐ...

रामकृष्ण मिशन : स्वामी विवेकानंद #

रामकृष्ण मिशन : • रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानन्द ने 1897 ई. में वेलूर (कलकत्ता) में की थी। मिशन के दो मठ बारानगर (कलकत्ता) एवं मायावती (अल्मोड़ा) में स्थापित किए गए थे। - स्वामी विवेकानन्द ने फरवरी, 1896 ई. में न्यूयॉर्क में वेदान्त सोसायटी का गठन भारतीय धर्म एवं दर्शन के प्रचार के लिए किया था।  - स्वामी विवेकानन्द ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद आदि का समर्थन किया, क्योकि इनका मानना था कि ईश्वर साकार एवं निराकार दोनों है और उसकी अनुभूति प्रतीकों के रूप में की जा सकती है। स्वामी विवेकानंद :  स्वामी विवेकानन्द (नरेन्द्रदत्त) का जन्म 1863 ई. में कलकत्ता में हुआ था।  - ये 1893 ई. में अमेरिका के शिकागो में आयोजित प्रथम विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए गए।  - अमेरिका जाने से पहले खेतड़ी के. राजा के सुझाव पर नरेन्द्र नाथ ने अपना नाम स्वामी विवेकानन्द रख लिया।  शिकागो धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द ने सभी धर्मों की एकता के विषय में कहा था जिस प्रकार सभी धाराएँ अपने जल को सागर में ले जाकर मिला देती हैं,...

प्रार्थना समाज : आत्माराम पाण्डुरंग #

प्रार्थना समाज : आत्माराम पाण्डुरंग  • ब्रह्म समाज के प्रभाव से महाराष्ट्र में 1867 ई. में प्रार्थना समाज की स्थापना हुई।  - इस संगठन का उद्देश्य हिन्दू धर्म तथा समाज में सुधार लाना था। -  प्रार्थना समाज ने जाति-व्यवस्था तथा पुरोहितों के आधिपत्य की आलोचना की प्रार्थना समाज की स्थापना डॉ. आत्माराम पाण्डुरंग ने की।  बाद में आरजी भण्डारकर तथा महादेव गोविन्द रानाडे इस समाज में शामिल हुए। -  प्रार्थना समाज की स्थापना के प्रेरणास्रोत केशवचन्द्र सेन थे।। - महादेव गोविन्द रानाडे को पश्चिम भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अग्रदूत कहा जाता है।  - 1871 ई. में रानाडे ने सार्वजनिक समाज की स्थापना की।  - इन्हें ' महाराष्ट्र का सुकरात भी कहा जाता था।  - महादेव गोविन्द रानाडे ने 1884 ई. में दक्कन एजुकेशनल सोसायटी तथा 1891 ई. में महाराष्ट्र में विडो रिमैरिज एसोसिएशन की स्थापना की थी।  - महिलाओं के कल्याण के लिए आर्य महिला समाज की स्थापना पण्डिता रमाबाई ने की थी।  - आर्य  समाज के एक अन्य अनयायी प्रो. डी...

ब्रह्म समाज और राजा राममोहनराय #

ब्रह्म समाज और राजा राममोहनराय :  • 20 अगस्त, 1828 को राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना कलकत्ता (कोलकाता) में की। राजा राममोहन राय अरबी, फारसी, संस्कृत के अतिरिक्त अंग्रेजी, फ्रांसीसी. लैटिन, यूनानी तथा हिब्रू भाषाओं का ज्ञान रखते थे। इन भाषाओं के ज्ञान से उन्होंने पाश्चात्य दर्शन को आत्मसात् किया, जिसका प्रतिबिम्बन ब्रह्म समाज के रूप में सामने आया। ब्रह्म समाज ने मूर्तिपूजा का विरोध किया। • एकेश्वरवाद का समर्थन करते हुए, ब्रह्म समाज ने धों की आपसी एकता का सिद्धान्त दिया। तीर्थ यात्रा तथा कर्मकाण्ड का विरोध किया तथा धार्मिक ग्रन्थों की व्याख्या के लिए पुरोहित वर्ग को अस्वीकार किया गया। • राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध ऐतिहासिक आन्दोलन किया। इनके प्रयासों से ही 1829 ई. में सती प्रथा निषेध कानून बनाया गया  • उन्होंने डेविड हेयर के सहयोग से कलकत्ता में हिन्द कॉलेज की स्थापना की। 1825 ई. में उन्होंने कलकत्ता में वेदान्त कॉलेज की स्थापना की। राजा राममोहन राय के बाद देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 1843 ई. में ...

राजा राममोहन राय भारतीय पुर्नजागरण के अग्रदूत :

राजा राममोहन राय भारतीय पुर्नजागरण के अग्रदूत : - राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई, 1774 को हुगली (बंगाल) में हुआ था।  - इनकी शिक्षा पटना एवं बनारस में हई थी।  - इन्होंने जॉन डिग्बी के दीवान के रूप में कम्पनी में कुछ समय तक कार्य किया था। -  इनका पहला ग्रन्थ फारसी भाषा में तोहफत-उल-मुवाहिदीन (एकेश्वरवादियों को उपहार) 1809 ई. में प्रकाशित हुआ।  - 1814 ई. में राजा राममोहन राय ने अपने युवा समर्थकों के सहयोग से आत्मीय सभा की स्थापना की।  - राजा राममोहन राय ने बांग्ला भाषा में संवाद कौमुदी का प्रकाशन किया।  -1820 ई. में उन्होंने प्रीसेप्ट ऑफ जीसस नामक पुस्तक प्रकाशित की। इसमें इन्होंने ईसाईत्रयी (पिता, पुत्र, परमात्मा) अर्थात् चमत्कारी कहानियों का विरोध कर मात्र न्यूटेस्टामेण्ट के नैतिक तत्त्वों की प्रशंसा की। - राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत माना जाता है।  - सुभाषचन्द्र ने उनको युगदूत कहा था।  - राजा राममोहन राय को राजा की उपाधि मुगल शासक अकबर द्वितीय ने दी थी।  इन्होंने 1822 ई. में फार...

होमरूल लीग और आंदोलन

होमरूल लीग और आंदोलन :  28 अप्रैल, 1916 को तिलक ने एवं 3 सितंबर, 1916 को एनी बेसेंट ने अपनी-अपनी होमरूल लीग की स्थापना की।  बेसेंट ने 'कॉमनवील' और 'न्यू इंडिया' तथा तिलक ने 'मराठा' और 'केसरी' के माध्यम से अपनी-अपनी लीग का प्रचार किया।  - तिलक द्वारा स्थापित होमरूल लीग के प्रथम अध्यक्ष जोसेफ बैपटिस्टा तथा सचिव एन.सी.केलकर थे। - एनी बेसेंट द्वारा स्थापित लीग के सचिव जॉर्ज अरुंडेल थे।  तिलक और एनी बेसेंट ने अपने अपने कार्यक्षेत्रों का बंटवारा भी कर दिया।  तिलक के लीग के जिम्मे कर्नाटक, महाराष्ट्र (बंबई को छोड़कर) मध्य प्रांत एवं बरार। देश के शेष हिस्से एनी बेसेंट की लीग के जिम्मे आए,   दोनों लीगों ने अपना विलय नहीं किया क्योंकि एनी बेसेंट के शब्दों में, "उनके (तिलक) कुछ समर्थक मुझे पसंद नहीं करते और मेरे कुछ समर्थक उन्हें नापसंद करते थे,  लेकिन मेरे और उनके बीच किसी तरह का कोई झगड़ा नहीं था।" होमरूल आंदोलन के दोनों नेताओं तिलक एवं एनी बेसेंट की निगाह में स्वराज का अर्थ करीब एक जैसा ही था ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत ...

सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 और महात्मा गांधी :

सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 और महात्मा गांधी  :  1929 में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस कार्यकारिणी को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का अधिकार दिया गया।  फरवरी, 1930 में साबरमती आश्रम में हुई कांग्रेस कार्यकारिणी की दूसरी बैठक में महात्मा गांधी को इस आंदोलन का नेतृत्व सौंपा गया।  महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1930 को अपना प्रसिद्ध 'दांडी मार्च' शुरू किया।   उन्होंने साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) से 78 चुने हुए साथियों के साथ सत्याग्रह के लिए कूच किया। 24 दिनों की लंबी यात्रा के बाद उन्होंने 6 अप्रैल, 1930 को दांडी में सांकेतिक रूप से नमक कानून भंग किया और इस प्रकार नमक कानून तोड़कर उन्होंने औपचारिक रूप से सविनय अवज्ञा आंदोलन का शुभारंभ किया।  - सुभाष चंद्र बोस ने गांधीजी के इस अभियान की तुलना नेपोलियन के एल्वा से पेरिस की ओर किए जाने वाले अभियान से की थी।   एक अंग्रेजी समाचार संवाददाता ने खिल्ली उड़ाई और कहा कि "क्या सम्राट को एक केतली में पानी उबालने से हराया जा सकता है।" इसके उत्तर में गांधीजी ने कहा-"गांधी महोदय समुद्री जल को ...

खिलाफत आंदोलन 1919 और महात्मा गांधी

खिलाफत आंदोलन प्रारंभ करने के लिए गठित खिलाफत कमेटी  :  'शौकत अली, मुहम्मद अली, अबुल कलाम आजाद, हकीम अजमल खान, हसरत मोहानी तथा डॉ. अंसारी शामिल थे।   तथापि खिलाफत आंदोलन प्रारंभ करने का श्रेय मुख्यतः अली बंधुओ-शाकत अला एव मुहम्मद अली बंधुओं-शौकत अली एवं मुहम्मद अली को दिया जाता है।  कारण : - भारत के मुसलमान तुर्की के सुल्तान को इस्लामी साम्राज्य का खलीफा मानते थे। प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की मित्र देशों के विरुद्ध लड़ रहा था।  युद्ध के समय ब्रिटिश राजनीतिज्ञों ने भारतीय मुसलमानों को वचन दिया था कि वे तुर्की साम्राज्य को किसी प्रकार समाप्त नहीं होने देंगे, लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने तुर्की साम्राज्य का विघटन कर दिया। भारतीय मुसलमान ब्रिटिश साम्राज्य से नफरत करने लगे और उन्होंने तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य की रक्षा और खलीफा को बनाए रखने के लिए आंदोलन प्रारंभ किया। तर्की साम्राज्य के विभाजन के विरुद्ध शुरू हुए। खिलाफत आंदोलन ने उस समय अधिक जोर पकड़ लिया जब इसमें गांधीजी सम्मिलित हुए। अंग्रेजों द्वारा ती साम्राज्य क...

असहयोग आंदोलन 1920 और महात्मा गांधी

महात्मा गांधी और असहयोग आंदोलन :  सितंबर, 1920 में कलकत्ता में संपन्न भारतीय राष्ट्रायक विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी ने असहयोग के प्रस्ताव का था जिसका सी.आर. दास ने विरोध किया था।   दिसंबर, 1920 में नागपुर में संपन्न कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा हुई तथा इसका अनुसमर्थन किया गया।  नागपूर अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव सी.आर. दास ने ही प्रस्तावित किया था। गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन 1 अगस्त, 1920 को प्रारंभ किया गया। पश्चिमी भारत, बंगाल तथा उत्तरी भारत में असहयोग आंदोलन को अभूतपूर्व सफलता मिली।" असहयोग आंदोलन के दौरान ही मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू तथा राजेंद्र प्रसाद न्यायालय का बहिष्कार कर आंदोलन में कूद पड़े थे।  5 नवंबर, 1920 को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू होने के 'एक वर्ष के भीतर स्वराज' प्राप्त करने का नारा दिया। इसके साथ ही सरकारी उपाधि, स्कूल न्यायालयों तथा विदेशी समानों का पूर्णतः बहिष्कार की योजना भी थी।  असहयो...

स्वराज पार्टी का गठन 1923

स्वराज पार्टी की स्थापना और उद्देश्य :  1919 के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा स्थापित केंद्रीय तथा प्रांतीय विधानमंडलों का कांग्रेस ने गांधीजी के निर्देशानुसार बहिष्कार किया था और 1920 के चुनावों में भाग नहीं लिया। असहयोग आंदोलन का समाप्ति और गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद देश के वातावरण में एक अजीब निराशा का माहौल बन गया था।   ऐसी स्थिति में मोतीलाल नेहरू तथा सी.आर. दास ने एक नई विचारधारा को जन्म दिया। मोतीलाल नेहरू तथा सी.आर. दास ने कांग्रेस को विधानमंडलों के भीतर प्रवेश कर अंदर से लड़ाई लड़ने का विचार प्रस्तुत किया तथा 1923 के चुनावों के माध्यम से विधानमंडल में पहुंचने की योजना बनाई। किंतु 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में बहुमत के साथ इस योजना को अस्वीकार कर दिया गया।   सी.आर. दास  (इस दौरान वे कांग्रेस के अध्यक्ष थे) ने कांग्रेस की अध्यक्षता से त्याग-पत्र दे दिया और मार्च, 1923 में मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर 'स्वराज पार्टी की स्थापना की।   इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य चुनावों के माध्यम से काउंसिलों में प्रवेश कर तथा उन्...

मुस्लिम लीग का गठन (1906)

मुस्लिम लीग का गठन (1906) :  अक्टूबर, 1906 में आगा खां के नेतृत्व में मुस्लिमों के शिमला प्रतिनिधिमंडल ने एक ऐसी केंद्रीय मुस्लिम सभा बनाने का विचार किया जिसका उद्देश्य मुसलमानों के हितों का संरक्षण हो।   इसी विचारण के अनुरूप ढाका में संपन्न अखिल भारतीय मुस्लिम शैक्षिक सम्मेलन (All India Mohammadan Educational Conference) के दौरान दिसंबर, 1906 में इस सम्मेलन के स्वागत समिति के अध्यक्ष तथा राजनीतिक बैठकों के संयोजक ढाका के नवाब सलीमुल्लाह खान ने अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के गठन का प्रस्ताव किया।  56 सदस्यीय अस्थायी समिति का चयन किया गया और मोहसिन-उल-मुल्क तथा वकार-उल-मुल्क को संयुक्त रूप से संगठन का सचिव नियुक्त किया गया। लखनऊ में मुस्लिम लीग का मुख्यालय बनाया गया और आगा खां इसके प्रथम अध्यक्ष बनाए गए। इस संगठन के तीन उद्देश्य थे - (1) ब्रिटिश सरकार के प्रति मुसलमानों में निष्ठा बढ़ाना, (2) लीग के अन्य उद्देश्यों को बिना दुष्प्रभावित किए अन्य संप्रदायों के प्रति कटुता की भावना को बढ़ने से रोकना, (3) मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा और उनका ...

बंगाल विभाजन 1905 तथा स्वदेशी आंदोलन :

बंगाल विभाजन 1905 तथा स्वदेशी आंदोलन :  ब्रिटिश सरकार ने 20 जुलाई, 1905 को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा कर दी। 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में एक ऐतिहासिक बैठक में स्वदेशी आंदोलन की विधिवत घोषणा कर दी गई। इसमें ऐतिहासिक बहिष्कार प्रस्ताव पारित हुआ। इसी के बाद से बगाल का विभिन्न क्षेत्रों में बंग-भंग विरोधी आंदोलन औपचारिक रूप से एकजुट होकर प्रारंभ हो गया।   16 अक्टूबर, 1905 को बंगाल विभाजन प्रभावी हो गया। इस दिन पूरे बंगाल में 'शोक दिवस' के रूप में मनाया गया।  रबींद्रनाथ टैगोर के सुझाव पर संपूर्ण बंगाल में इस दिन को ‘राखी दिवस' के रूप में मनाया गया।     विभाजन के बाद बंगाल, पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में बंट गया। पूर्वी बंगाल और असम को मिलाकर एक नया प्रांत बनाया गया जिसमें- राजशाही, चटगांव, ढाका आदि सम्मिलित थे। इस प्रांत का मुख्यालय ढा का में था।  विभाजन के दूसरे भाग में पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा और बिहार शामिल थे।  बंगाल का विभाजन लॉर्ड कर्जन (1899-1905 ई.) के काल में 1905 में किया गया था।  सर एन्ड्रज हेंडरसन लीथ ...